Saturday, October 9, 2010
अमित्रस्य कुतो दुखम
Friday, October 23, 2009
उसने कहा था तो लिखना ही होगा
Monday, May 11, 2009
उसने कहा था तो लिखना ही होगा
15 comments:
- आशुतोष said...
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बहुत अच्छा! शुरुआत इतनी शानदार होगी ये तो मैंने भी नहीं सोचा था. मैंने अपने कुछ पत्रकार मित्रों को यह लेख पढ़ाया, कोई मानने को तैयार नहीं था कि पहली बार का लेखन है. सब कहते हैं, किसी पेशेवर लेखक की कलम है. बस अब यह सिलसिला रुकना नहीं चाहिए. अपने आसपास या दूर की, जो भी बात दिल को छू जाय उस पर आपकी कलम चलानी चाहिए और हम उसका मजा लेंगे. कभी अपनी हॉस्टल लाइफ को भी पीछे मुड़ कर देखने की कोशिश की जाय, उसमें भी कई दिलचस्प चित्र छुपे हुए हैं. हाँ, बीच में पैराग्राफ दें और फॉण्ट साइज़ बड़ा कर दें तो बेहतर होगा.
- May 13, 2009 4:46 AM
- Ashok Pande said...
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आशुतोष के भेजे लिंक से यहां आया. जैसी उम्मीद थी उस से कहीं बेहतर. उम्दा शुरुआत, जोश्ज्यू! जय हो!
- May 13, 2009 5:45 AM
- Dinesh Semwal said...
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bahut khoob joshi ji!!!
dinesh semwal - May 14, 2009 8:05 AM
- jyotika said...
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devnagri me nahin likh pati.achchha hai.punch hai.sab kuchh waisa hi hai.har nai pidhi pichhli pidhi ko bekar samajhti hai.aap kitna hi achchha kyun n kar rahe hon aap nai generation or aapke beech ke gap ko par nahin kar pate..true.keep it up
- May 14, 2009 11:21 AM
- निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...
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मान्यवर, हिंदी ब्लॉगिंग जगत में आपका स्वागत है. आशा है कि हिंदी में ब्लॉगिंग का आपका अनुभव रचनात्मकता से भरपूर हो.
कृपया मेरा प्रेरक कथाओं और संस्मरणों का ब्लौग देखें - http://hindizen.com
आपका, निशांत मिश्र - May 17, 2009 8:09 AM
- रावेंद्रकुमार रवि said...
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दिलचस्प!
- May 17, 2009 10:18 AM
- वन्दना अवस्थी दुबे said...
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swaagat hai..shubhkaamnayen.
- May 17, 2009 10:34 AM
- दिल दुखता है... said...
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हिन्दी ब्लॉग की दुनिया में आपका तहेदिल से स्वागत है.....
- May 17, 2009 10:37 AM
- mastkalandr said...
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aapka swagat hai ,hamari shubhkamnaen sda aapke sath hai ..,keep it up ..mk
- May 17, 2009 1:12 PM
- radhasaxena said...
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welcom here.
- May 17, 2009 9:56 PM
- RAJNISH PARIHAR said...
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बहुत अच्छी.. लगी आपकी ये रचना...सच में हम आज तकनीक के गुलाम होते जा रहे है...!ये सिलसिला न जाने कहाँ जा के रुकेगा...
- May 17, 2009 10:33 PM
- नीरज कुमार said...
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Sir,
A great start...
You can write a good articles...
Best of luck! - May 18, 2009 5:24 AM
- Manoj Kumar Soni said...
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बहुत अच्छा लिखा है . कृपया मेरा भी साईट देखे और टिप्पणी दे
वर्ड वेरीफिकेशन हटा दे . इसके लिये तरीका देखे यहा
http://www.manojsoni.co.nr
and
http://www.lifeplan.co.nr - May 18, 2009 10:57 AM
- Deepak "बेदिल" said...
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wahhhhhh sarkaar..ye hui naa kuch baat
best of luck - May 18, 2009 1:10 PM
- संगीता पुरी said...
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बहुत सुंदर…..आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्लाग जगत में स्वागत है…..आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्त करेंगे …..हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।
- May 19, 2009 11:18 AM
What a joke!
Saturday, May 16, 2009
What a joke!
फौज का एक कुप्रसिद्ध जोक है एक फौजी जवान के घर श्रवण कुमार सरीखा पितृ भक्त पुत्र पैदा हुआ. बहुत ही काबिल. पढाई पूरी करने के बाद पिता से पूछा उसे क्या करना चाहिए पिता ने उसे फौज में अफसर बनने की सलाह दी. लड़का अफसर बनने के बाद पिता से मिलने आया, पैर छुए फिर पिता से पूछा और कुछ इच्छा जो वो पूरी कर सकता हो. पिता ने फौजी कमान दी
लड़का सावधान में आ गया.
पीछे मुड़!
लड़का पीछे मुड़ा तो कस के एक लात मारी. ,"२५ साल से हसरत थी एक अफसर के पिछवाडे में लात मारने की"
इस जोक को अन्यथा न लें. हम अपनी कुंठाएं, अपने मातहतों, अपने बीवी बच्चों, कभी कभी अपने प्रिय मित्रों पर ही तो निकालते हैं. दफ्तर में बॉस की बदसलूकी का बदला बीवी का बनाया खाना फेंक कर या बच्चों को थप्पड़ मारकर लिया जाता है.
जोक जोक नहीं होते आप बीती होते हैं . कभी कभी सोचने को मजबूर कर देते हैं. हम फिल्म देखते हैं तो हीरो के जूते अपने पैरों में डाल लेते हैं. तीन घंटे तक वही सब कुछ कर रहे होते हैं जो हीरो करता है. क्या कभी तीन मिनट के जोक के साथ भी ऐसा हुआ है शायद तब हम हंस नहीं पाते . गालिब ने शायद लिखा होता :-
"हमको मालूम है जोक की हकीकत लेकिन
दिल के खुश रखने को गालिब ये ख्याल अच्छा है."
1 comments:
- sanjaygrover said...
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हुज़ूर आपका भी .......एहतिराम करता चलूं .....
इधर से गुज़रा था- सोचा- सलाम करता चलूं ऽऽऽऽऽऽऽऽ
कृपया एक अत्यंत-आवश्यक समसामयिक व्यंग्य को पूरा करने में मेरी मदद करें। मेरा पता है:-
www.samwaadghar.blogspot.com
शुभकामनाओं सहित
संजय ग्रोवर - May 18, 2009 9:23 AM
दरद न जाणै कोय
Friday, June 19, 2009
मैं अपने जैसे आम शब्दों की जिंदगी में खुश था। लोग मेरा धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रहे थे। अलग अलग तरीके से। कुछ लोग मुझे कान ही नहीं देते। कुछ एक कान से सुन के दूसरे कान से निकाल देते। कुछ दोनों कानों से सुनते मुंह से निकाल देते। कुछ लोग जब मुझे पेट में रख लेते तो मुझे थोडी तकलीफ होती पर देर सबेर उगल तो वो भी देते ही अब तक मुझे कोई भी पचा नहीं पाया क्योंकि मैं भी आत्मा की ही तरह अजर अमर हूँ।
पिछले दिनों मेरे साथ एक अजीब सा हादसा हो गया। एक सज्जन मुझे अपने पेट में रखकर ले गए, मैं अन्दर ही अन्दर घुटता रहा। दो तीन दिन के बाद अपने एक प्रिय मित्र जो एक शब्द शास्त्री हैं, के सामने उगल दिया। बोले, " मित्र इसमें मुझे काफी संभावना नजर आती है। इसका कुछ करो"। उन शास्त्रीजी के सामने से मैं कई बार गुजर चुका था उन्होंने कभी मुझे इस नजर से नहीं देखा था। मुझे यकीन था कि वो मुझे लौटा देंगे। पर ये क्या उन्होंने तो तुंरत मुझे अपने ऑपरेशन थियेटर में डाल दिया। ये मेरी समझ में नहीं आता कि लोग अपने प्रियों की बात क्यों नहीं टाल पाते? रामायण में अपनी प्रिय पत्नी के कहने पर राम हिरन के शिकार पर निकल पड़ते हैं हालाँकि कहीं भी उनके मांसाहारी होने का जिक्र नहीं आता। सलमान ने किसके उकसाने पर हिरन का शिकार किया था सबको मालूम है।
शास्त्री जी ने सिगरेट सुलगाई और मेरा मुआइना करने लगे। धुएँ के छल्ले बनाते बनाते अचानक आर्कमडीज की तरह चिल्लाए, "मिल गई मिल गई, वह धातु मिल गई जिससे यह बना है"। ये कौन सी बड़ी बात हो गई शब्द तो धातु से ही बनते है। इसीलिए तो वाद्य यंत्रों के तार धातुओं के बने होते है ताकि अच्छी अच्छी धुनें निकलें। घंटे की टनटन हो या घंटी की टिनटिन या घुंघुरू, पायल की छम छम सब धातुओं का ही कमाल है। लकड़ी की ठक ठक भी कोई शब्द है भला? अब उन्होंने मेरा जन्म समय निकाला जो आर्यों के समय का निकला । हाँ जन्म स्थान अस्पष्ट था ये भारत, मध्य एशिया, उत्तरी ध्रुव या कोई दूसरा ग्रह भी हो सकता था। उसके बाद मेरा डी एन ए निकाल कर कई भाषाओँ के शब्दों से मिलाया, मैं एक काली गर्दन वाला हिन्दुस्तानी शब्द और मेरा डी एन ए एक गोरे चिट्टे अंग्रेजी , एक मोटे ताजे रूशी , एक काले कलूटे अफ्रीकी और अरबी फारसी के कई शब्दों से मिला। न शक्ल मिलती है न सूरत पर विज्ञानं का जमाना है। डी एन ए रिपोर्ट झुठलाई तो नहीं जा सकती। फ़िर ये भी पता चला कि मैं मैं संस्कृत में पैदा हो कर फ़िर अरबी फारसी में घूम घाम कर मुग़लों के साथ वापस हिंदुस्तान पहुँचा था।
शास्त्री जी ने मुझपर एक डेढ़ पेज का लेख लिख डाला। अपने उस मित्र का भी जिक्र उन्होंने किया। ये उनकी ही लेखनी का कमाल था कि हम तीनों की जबरदस्त तारीफ हुई। देखते ही देखते मैं बड़े बड़े लोगों की जुबान में चढ़ गया था. इस अनायास मिली शोहरत से मैं काफी खुश था. मैं अब आम नहीं एक खास शब्द बन गया था।
शोहरत अनायास मिले या प्रयत्न से उसकी कीमत तो चुकानी ही पड़ती है। मुझे भी चुकानी पड़ी। मेरे साथियों ने मुझे स्वीकार नहीं किया। मैं उस जंगली जानवर की तरह था जो मनुष्यों के हाथ से जैसे तैसे भागकर जंगल चला तो गया पर अपने ही साथियों के द्वारा प्रताडित किया गया। आम लोगों ने मेरा इस्तेमाल बंद कर दिया और खास लोगों के पास समय ही कहाँ होता है. आठ आठ आंसू रोता मैं अपने वो दिन याद करता हूँ।